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मैं जो थक जाऊं तो परछाईं को चलता देखूं...

Posted On: 14 Mar, 2012 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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हम पढ़ रहे थे ख़्वाब के पुर्ज़ों को जोड़ के
आँधी ने ये तिलिस्म भी रख डाला तोड़ के

… इन पानियों से कोई सलामत नहीं गया
है वक़्त अब भी कश्तियाँ ले जाओ मोड़ के
…………….

हिंदी फिल्मों के जो चंद गिने चुने गीत आज भी जेहन में हैं, उनमें भी शहरयार ही हैं–

ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें

सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें
दिन ढले यूँ तेरी आवाज़ बुलाती है हमें
………………….

और आखिर में शहरयार के सपने को दिल के बहुत भीतर से उठी एक सच्ची तड़प का सलाम—–

एक ही धुन है कि इस रात को ढलता देखूं
अपनी इन आंखों से सूरज को निकलता देखूं
ये जुनूं तुझसे तकाजा यही दिल का मेरे
शहरे उम्मीद के नक्शे को बदलता देखूं
ये सफर वो है कि रुकने का मुकाम इसमें नहीं
मैं जो थक जाऊं तो परछाईं को चलता देखूं
………………………..

और शहरयार यहां भी–

दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूं कितना है
नोके खंजर ही बताएगी लहू कितना है
जमा जो करते रहे अपने को जर्रा-जर्रा
वो ये क्या जानें बिखरने में सुकूं कितना है।
…………….

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
March 15, 2012

चंद्रजीत जी, मशहूर शायर शहरयार साहब के लिए सुन्दर श्रद्धांजलि पेश की है आपने. इश्वर उन्हें जन्नत नसीब करवाए.

March 14, 2012

खुबसूरत शेरों को हमारे बिच लाने का बहुत-बहुत शुक्रिया…….हार्दिक आभार.

yogi sarswat के द्वारा
March 14, 2012

चंद्रजीत जी नमस्कार ! शहरयार साब तो दुनिया से विदा हो गए किन्तु उनकी शायरी हमेशा जिन्दा रहेगी ! ये मेरा सौभाग्य है की वो मेरे गृह जनपद अलीगढ से हैं जहां श्री नीरज जैसे गीतकार भी पैदा हुए हैं ! शहरयार साब की शायरी में एक रवानी है , जो कभी खुश करती है कभी अनायास ही दुखी कर देती है ! बहुत बढ़िया संकलन !

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 14, 2012

चंद्रजीत जी नमस्कार, ये सफर वो है कि रुकने का मुकाम इसमें नहीं मैं जो थक जाऊं तो परछाईं को चलता देखूं बहुत खूब……..


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